1 सितम्बर 1994: खटीमा गोलीकांड के शहीदों को नमन
1 सितम्बर 1994 का दिन उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा।
खटीमा, उधम सिंह नगर में शांतिपूर्ण ढंग से पृथक राज्य की मांग कर रहे निर्दोष आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई गईं। उनकी मांग सिर्फ पहचान, अधिकार और न्याय की थी, लेकिन उन्हें गोलियों से जवाब मिला।
उत्तराखंड के लोग वर्षों से उपेक्षा झेलते आ रहे थे। पहाड़ों के गाँव बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे। न स्कूल ठीक से, न अस्पताल, न रोजगार के अवसर। नौजवान रोज़गार की तलाश में मैदानों और अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर थे। पहाड़ की बेटियाँ पानी और लकड़ी के लिए मीलों चलती थीं, लेकिन उनकी तकलीफ़ सुनने वाला कोई नहीं था।
सरकारें आती-जाती रहीं, पर हमारी समस्याएँ अनसुनी रह गईं।
इसी अन्याय और उपेक्षा से तंग आकर लोगों ने आवाज़ उठाई।
हमें चाहिए अपना राज्य, जहाँ हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, और हमारी पीड़ा को समझने वाली सरकार हो।
1 सितम्बर का दिन उन हजारों आवाज़ों का प्रतीक है, जिन्हें खामोश करने की कोशिश की गई। लेकिन गोलियों से दबाई गई यह आवाज़ और गूंज उठी। यही गूंज आगे चलकर उत्तराखंड राज्य की नींव बनी।
उन गोलियों ने हमसे हमारे वीर सपूत छीन लिए:
- पुष्कर सिंह कठैत
- जगत सिंह बोहरा
- राजेन्द्र सिंह कठैत
- राजेश भट्ट
- रवि नौटियाल
- पारमहेश्वर दत्त
- गुरविंदर सिंह
- चन्द्रशेखर तिवारी
- सुरेन्द्र सिंह भंडारी
- महेश जोशी
- देवेन्द्र सिंह
ये निहत्थे थे, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठा रहे थे, लेकिन गोलियों से उन्हें खामोश कर दिया गया। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसी आग ने उत्तराखंड राज्य की नींव रखी।
उनकी शहादत ने हमें सिर्फ एक राज्य नहीं दिया, बल्कि हमारी पहचान दी। पहले हम बड़े उत्तर प्रदेश का हिस्सा कहे जाते थे, हमारी पीड़ा अक्सर वहां की राजनीति में दब जाती थी।
लेकिन इन वीरों की कुर्बानी ने हमें वह गौरव दिया कि आज हम गर्व से कह सकते हैं हम उत्तराखंडी हैं, अपनी भाषा, संस्कृति और अस्मिता वाले।
आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो दिल गर्व और पीड़ा दोनों से भर जाता है। पीड़ा उनके असमय चले जाने की, और गर्व इस बात का कि उनकी शहादत ने हमें अपनी अलग पहचान, अपना राज्य दिया।
शहीदों को कोटि-कोटि नमन।
आपका बलिदान सदैव अमर रहेगा।